Tuesday, August 9, 2011

एक छवि!




"बस माँ ! अब मुझे जाना है", अपनी छोटी सी गठरी को उठाते हुए चन्ना बोली!
"ऐसे कहाँ जाएगी लाडो? रुआंसा होती माँ ने पूछा!" इस निर्दय समाज ने तुझ से सवाल पूछे तो? अकेले कैसे रहेगी...?" धीमी होती वाणी माँ की स्पष्ट थी! मुंह में साडी का पल्लू दबा कर कुछ बोल रहीं थीं!
दोनों भाई और चुटकी अन्दर के कमरे में किवाड़ के पीछे छुप सब सुन रहे थे! अपितु उनके समझ के परे था ...सब कुछ !
और बाबा ... एक कोने में अपना सर पकडे बेठे थे !
"नहीं माँ कोई कुछ न कहेगा! न पूछेगा ! समय कहाँ है किसी के पास ! बस अपना मार्ग मुझ को मिल गया है ! इस निर्धनता के जीवन से कठिन तो कोई भी जीवन न होगा माँ ! "
"मुझे माफ़ करना बेटी ! में तेरे लिए कुछ भी न कर पाई ! "
और बाबा के पास जा माँ ने उनको झकझोरा " आप रोको इसे! कुछ तो कहो! हमेशा की तरह कहो की सब कुछ ठीक हो जाएगा ! " पर बाबा न उठे ! लज्जान्वित नयन जल धारा बरसा रहे थे ! कैसे रोक लें ! क्या उपाए है! क्रोध में ही तो कहा था ! इसका ब्याह रचाऊं या अपने परिवार को पालूं ! दरिद्रता का उपाए नहीं जब तो इसके जीवन का कैसे होगा! अपना मार्ग स्वयं चुन ले तो यही उचित है!
माँ मुर्छित सी हो वहीँ बैठ गई!
चन्ना अब नहीं रुकना चाहती थी! न किसी को सांत्वना ही दे पाई! उसका मन टीस से न भर प्रफुल्लित था ! स्वतंत्रता का अभिमान भी था उस में ! और अपना मार्ग खोज लेने का दृढ निश्चय ! बस नेत्र एक छवि को बार बार धुन्ध्लाकर उस के सामने ला खड़ा करते थे! जीवंत क्यूँ नहीं होती ये छवि ...बस यह सोच नेत्र अश्रु पूरित हो उठते!
माँ का ह्रदय कैसे मान जाए! " तू दरिद्रता से भाग रही है न? अपने कर्तव्यों से भी...! मत जा लाडो मुझे तेरी आवश्यकता है ! "
"नहीं माँ! ऐसा न कहो! दरिद्रता तो अपने दैहिक जीवन की यातना है! और तुम तो जानती हो न मेरा लक्ष्य! ? माँ मुझे वो छवि खोजनी है ,उसे जीवंत करना है सफल करना है! माँ ! मेरे ब्याह में खर्च करने वाली थी जो उसे मेरे भाई बहिनों की पढाई में लगाना! तुम से प्रार्थना है!
"जिस छवि के पीछे तू भाग रही है उस का कोई पता ठिकाना नहीं है चन्ना ! "
"माँ, मुझे तो गुरु के मार्ग पर चल कर पता मिल जाएगा ! मगर तुम और बाबा मिल कर जीवन संभाल लेना! और देखना मेरे अन्य भाई बहिनों को उच्च शिक्षा मिले! सुन रही हो न माँ? बाबा ये बात समझ गए है ! तुम भी मुझे मत रोको! मेरे एक के चले जाने से अगर निर्धनता दूर होती है तो होने दो न माँ !"
चन्ना अपनी गठरी पकडे बाहर निकलने लगी ! जैसे ही दरवाज़े तक पहुंची बाबा उसके सामने आ खड़े हुए ! और एक तमाचा चन्ना के मुंह पर जड़ दिया! " अरे तू इतनी अहंकारी है कैसे उस छवि को खोज सकती है जिसे इश्वर कहते हैं? मैंने सिर्फ अपना दुःख बांटा तुझ से और तू , तुने तो मुझे बेटी का हत्यारा ही बना दिया! हाँ हम निर्धन है ! मगर तू मेरा अभिमान रही है! तेरी माँ से भी इतनी उम्मीद न थी जितनी तुझ से !तू मेरा हर कठिन समय में साथ देगी! पर जा! तू अभी चली जा! ," उसे धक्का देते हुए बाबा ने घर के बाहर खड़ा कर दिया! और किवाड़ बंद कर दिए!
चन्ना को बाबा का हर शब्द समझ मैं आ रहा था! वो वहीँ खड़ी रह गई! गठरी भी उसकी वहीँ हाथों से छूट गई!एक छवि जिसे वह धुंधली समझ रही थी सामने उभरने लगी !"बाबा" , उसके मुंह से फूट पड़ा," और पलट कर किवाड़ पीटने लगी! " बाबा ,मझे माफ़ कर दो! मुझे माफ़ कर दो बाबा!"....... ...

3 comments:

  1. सार्थक रचना....बधाई...

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  2. सार्थक पोस्ट ....बधाई...

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