Sunday, August 28, 2011

डर...

स्मिता अपनी बेटी स्वीटी को स्कूल छोड़ कर कार में चाबी लगा ही रही थी की फ़ोन की घंटी बज गई !
-इस वक़्त कौन होगा पता नहीं ,
"हेल्लो!"
"हेल्लो !स्मिता बोल रही है!"
"हाँ ! आप कौन ?"
"पहचाना नहीं न स्मिता ! मैं प्रिया !"
इस नाम के कानो में गूंजते ही स्मृतियों की रेल सी स्मिता के ज़हन में बनने लगी !
-मेरी सब से अच्छी दोस्त ! बचपन से लेकर सांतवी कक्षा तक साथ ही पढ़े थे! सब तो येही समझते थे की हम जुड़वाँ बहने हैं ! जहाँ भी जाते हर जगह साथ ही दिखाई देते थे! अरे एक दुसरे के बिना तो जीवन को सोच भी नहीं पाते थे! पर प्रिया ने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया था? ऐसा क्या हुआ था की इतने सालों की दोस्ती कुछ क्षणों में ही खत्म कर दी?
स्मिता का मन तो फ़ोन काट देने का हो रहा था ! मगर प्रिया से आज भी वो पूछना चाहती थी! क्या हुआ था तब ?
"क्या हुआ स्मिता ?"
"कुछ नहीं ! कैसी हो प्रिया ?"
"अच्छी हूँ..तुम कैसी हो?!"
"ठीक हूँ ! आज तक एक सच्चे दोस्त की तलाश में हूँ ! "
''में तुमसे मिलना चाहती हूँ स्मिता ! तुमसे माफ़ी मांगना चाहती हूँ ! तुमसे बात करना चाहती हूँ! तुम्हारे शहर में हूँ ! माँ से तुम्हारा नंबर लिया था! में सिटी माल के काफी शॉप पर तुम्हारी राह देख रही हूँ ! प्लीस आजाओ!!"
बोलते बोलते प्रिया की आवाज़ थकी सी लगने लगी !
न चाहते हुए भी स्मिता ने हाँ कह दिया ! और घडी देख कर कार स्टार्ट कर दी!
-अभी स्वीटी की छुट्टी होने में चार घंटे हैं! समय पे आ ही जाउंगी! वरना चोव्किदार को तो पैसे दे ही रखे हैं! ध्यान रखेगा मुझे देर हुई तो!पर ये प्रिया अब क्यूँ मुझ से मिलना चाहती है? हुंह! कोई बहाना बना देगी अब! मगर बस! मैं उस से और मेल जोल नहीं बढ़ा सकती !लेकिन मेरे सवालों का उसे जवाब तो देना ही होगा!
इसी उधेड़ बुन में स्मिता सिटी माल पहुँच गई थी!गाड़ी पार्क कर के काफ्फी शॉप पहुंची तो वहां दो चार लोगों के अलावा कोई नहीं था! चारों तरफ स्मिता ने नज़र दोड़ाई! काफी शॉप के एक कौने दुबकी हुई सी एक औरत पे नज़र गई !
-नहीं ! ये तो प्रिया हो ही नहीं सकती! प्रिया का उस समय भी कितना प्रभावशाली व्यक्तित्व था!
और फिर से स्मिता उन्ही स्मृतियों में खोने लगी ! चुलबुली ,हंसमुख, चपल ....सुन्दर ! वो प्रिया ...
"स्मिता !"
इस आवाज़ ने स्मिता को अपने स्वप्नलोक से बहार ला खड़ा किया!
वही कोने वाली औरत ... प्रिया ! ?
"नामुमकिन!?"
प्रिया की इस शब्द पर आँखें नीची हो गईं! जैसे उस ने कोई गुनाह किया हो! गुनेहगार तो वो थी ही स्मिता की नज़रों में !
काफी का आर्डर देकर दोनों उसी कोने वाली मेज़ के इर्द गिर्द बैठ गए !
स्मिता ने फिर घडी देखी! ज्यादह समय नहीं था उस के पास ! प्रिया को घूरने सी लगी ! अब भी उसे यकीन तो नहीं हो रहा था !
बेडोल शरीर ! अजीब सी झूकी हुई कमर! और गर्दन ... पता नहीं किस बोझ से दब गई थी! ? क्या यौवन अवस्था में आते आते कोई इतना भी बदल सकता है!
" कहो प्रिया क्यूँ बुलाया तुम ने? मुझे मेरी बेटी को लेने जाना है ! जल्दी करो !"
प्रिया के चहरे पर पड़ी झुर्रियां और घहरा गईं!
"तुम मुझ से नहीं पूछोगी क्या हुआ था तब की..."
"यही पूछने आई हूँ प्रिया ! आखिर क्या हुआ था? मैंने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा ? हम दोनों एक दुसरे के लिए क्या नहीं थे! और एक दुसरे के अलावा और कोई दोस्त भी तो नहीं था हमारा? और आज तक तुम्हारी वजह से कोई दोस्त नहीं बना पाई हूँ !बताओ क्या बहाना है तुम्हारे पास ! ? मुझ से भी अच्छी कोई और दोस्त तुम्हे मिली होगी ...और .."
इतना बोलते हुए स्मिता की नज़र प्रिया की आँखों से बरसते आंसुओं पर गई! उसे लगा शायद कुछ ज्यादह ही बोल गई थी वो! उसे नहीं कहना चाहिए था!
"सॉरी ! सॉरी प्रिया ! वो गुस्से में कुछ ..."
"नहीं स्मिता... तुम्हारी गलती नहीं है! गलती मेरी है और मुझे माफ़ी मांगनी है तुम से! मुझे लगा था तुम नहीं आओगी ! जो मैंने तुम्हारे साथ किया ...तुम्हारी जगह कोई और होता तो शायद नहीं आता! पर अच्छा है तुम आज आई ! इतने सालों का गुबार तुम्हारे अलावा किसके सामने निकाल पाती मैं!
तुम्हे याद है ... छठी कक्षा की परीक्षाओं के बाद हमने कितनी योजनाएं बनाएँ थी...! कहाँ कहाँ जाएँगे क्या क्या करेंगे ! मगर.."
"हाँ मगर तुम अपनी किसी दीदी की शादी में अपने भुआ और उनके बच्चों के साथ गाँव चली गई थी...मुझे धोखा देकर !अचानक से! "
"हाँ ! हमें ट्रेन में जगह नहीं मिली थी! उसी कम्पार्टमेंट में एक बड़ा लड़का था ! दिन में उस लड़के ने हम सब से बच्चों की तरह बातें कीं ! हम सब भी उसे भैया भैया कह कर उस के साथ खेल रहे थे! हम सब तो बच्चे ही थे न! रात में और भुआ को एक सीट मिली अगले कम्पार्टमेंट में ! और हम तीनों भाई बहन नीचे एक चद्दर बिछा कर सो गए!
हमारे पास ओढने के लिए कुछ भी नहीं था ! जिस के साथ पुरे दिन भैया भैया कर के खेल रहे थे उस ने उदारता दिखाते हुए अपनी बड़ी सी कम्बल अपनी सीट से लटका के हम बच्चों पर डाल दी!
स्मिता ... कल्पना भी नहीं कर सकती तुम क्या सब हुआ उस रात !उस लड़के ने हर तरह से मुझे छूने की कोशिश की! कभी हाथ पकड़ा.. कभी खींचना चाहा ! और मैंने वो रात अपने को बचाने में कैसे निकाली थी मुझे ही पता है ! सही गलत समझ नहीं आता था! क्या हो रहा था ... बस उस समय यही लग रहा था की घिन्न हो रही है और ये नहीं होना चाहिए! पूरी रात खुद को कभी सीट के नीचे कभी सामान के पीछे छुपाती रही! ऐसी बातों की समझ नहीं थी ... चिल्लाना नहीं आया मुझे! और भुआ जिस सीट पर सोई थी उनके पास जाकर पूरी रात बैठी रही! उस दिन मुझे खुद से घृणा होने लगी थी! ..."
स्मिता की आँखें भी भर आई !
"प्रिया तुम ने भुआ को उठा कर कहा क्यूँ नहीं ? नहीं तो घर आकर माँ बाबा को क्यूँ नहीं बताया !? वे तो समझते तुम्हारी बात !नहीं तो तुम मुझे बताती न! ... तुमने मुझ से बात क्यूँ नहीं की प्रिया?!\
"क्या बताती ? मुझे उस एक घटना से इतनी घृणा होने लगी थी की किसी तरह उसे भुलाना चाहती थी! और कहीं उसी चक्कर में मैं खुद को भुलाने लगी! माँ बाबा को लगा उम्र का झोल है... समय के साथ सब ठीक हो जाएगा! घंटो अपने को कमरे में बंद रखती थी! और स्मिता तुम्हारे सामने तो मुझे बिलकुल नहीं आना था! मुझे पता था ... तुम्हारे सामने तो मैं खुद को रोक ही नहीं पाऊँगी! और मेरे रोने का कारण कोई पूछे उस से पहले मैंने तुम से भी खुद को अलग कर लिया ! मैं बहुत छोटी थी स्मिता ... बहुत छोटी ! ... "
सुबकते हुए प्रिया ने अपनी झुकी गर्दन को और झुका लिया था ! स्मिता के मन में गुस्सा और घिन्नता का भाव भर गया !
" पर तुम क्यूँ शर्म से झुकी हो प्रिया ! अब तक उस बोझ को अपने ऊपर लेकर घूम रही हो! ? क्यूँ ? तुम्हारी क्या गलती है !? "
ये कहते कहते स्मिता चुप हो गई! क्या वो खुद प्रिया की जगह होती तो आवाज़ उठा पाती! ? शायद वो भी वही करती जो प्रिय ने किया! बारह साल की उम्र इतनी ज्यादह भी नहीं होती! सब समझते हुए भी कुछ समझ नहीं आता! गुस्सा तो उसे प्रिया की भुआ और माँ बाबा पर आ रहा था ! अपनी बेटी के अन्दर हुए बदलावों को समझ ही क्यूँ न पाए ! ? क्यूँ उसे अकेला हो जाने दिया! ? उफ़ !
स्मिता ने प्रिया के आंसू पोंछे!
"मुझे इस बात की ख़ुशी के प्रिया की तुम ने अपने दिल का गुबार आज निकाल दिया! अब हम दोनों मिल कर इस दुःख का हल ढूंढेंगे ! "
स्मिता की नज़र फिर से घडी पर गई! समय हो रहा था स्वीटी को लेने जाने का ! अजीब सा डर उसे अपनी बेटी के लिए लगने लगा! सब बच्चे चले गए वो अकेली रह गई तो! बाहर चोकीदार तो है ही... चोकीदार? क्या भरोसा! ?
प्रिया को फिर मिलने का वादा कर स्मिता फटाफट अपनी बेटी के पास पहुंचना चाहती थी! मगर उसे पता था की डर किसी बुरी चीज़ का हल नहीं हो सकता है! खुद को और अपनी बेटी को जागरूग करना बहुत आवश्यक है! और वो ऐसा ज़रूर करेगी! ...


2 comments:

  1. महिला की एक परेशानी को सुन्दर भावनाओं के साथ पेश किया है,
    अच्छा लेख,

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